कबाड़िन - कविता - शिव शरण सिंह चौहान 'अंशुमाली'

ओ कूड़ा बीनने वाली!
मल मिश्रित कूड़े में
क्या खोजती हो?
बाबूजी!
कबाड़ मेरा कंचन है
जो पालता है पेट मेरे बच्चों का
साथ ही बड़ी झोली में छिपा है–
मेरा भविष्य, मेरा सौंदर्य
और उस चिन्ता मुक्त जीवन का सुख 
जिसके लिए तरसते हैं–
लक्ष्मी-पुत्र।

शिव शरण सिंह चौहान 'अंशुमाली' - फतेहपुर (उत्तर प्रदेश)

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