बेटी - कविता - लाखम राठौड़

किसी गाय के बाछे की तरह
टुकर-टुकर देखती
असहाय-सी
निरीह
उदास बेटी,

आँगन में गेरुए रंग बनी
रंगोली की
एक सुंदर
लेकिन मिटि-मिटि-सी
लकीर बेटी,

सुंदर उपवन में खिले
अनगिनत महकते
फूलों के पास ही
कैक्टस सदृश
काँटेदार बेटी,

हज़ारों रोशनियों से भरे
चकाचौंध भरे
किसी गली के
नुक्कड़
पर लटकते
फ्यूज बल्ब-सी
अंधियारी बेटी,

किसी हॉरर फिल्म 
में अकस्मात् 
उभरने वाली 
डरावनी
नफ़रत भरी 
अदाकारा-सी
बेटी,

ख़ैर! अब बदलो ये उपमान
बदलने ही होंगे;
क्योंकि
किसी मंदिर में 
गूँजती आरती
उस मस्जिद की
अज़ान
चर्च की पूजा
और
इन सब में विराजमान
निरंजन ईश्वर 
ही
है
बेटी॥

लाखम राठौड़ - जोधपुर (राजस्थान)

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