बिन बुलाया मेहमान - कहानी - आशीष कुमार

वह आता है। रोज़ आता है। बिन बुलाए आता है। वह जो मेरा कुछ भी नहीं लगता पर मेरा बहुत कुछ है। उसे देखे बिना मैं नहीं रह सकता। वह यह बात जानता है और वह ख़ुद भी मेरे बिना नहीं रह सकता। दरअसल कुछ दिनों पहले आँधी आई थी। इतनी तेज़ कि किसी भी राहगीर का रुख़ बदल दे। पक्षियों का झुंड चहचहाते हुए अपने घोसलों तक पहुँचने की पुरज़ोर कोशिश कर रहा था। मैं अपनी बालकनी में खड़े होकर चेहरे पर मुस्कुराहट लिए यह सारा दृश्य देख रहा था। तभी एक नन्हे परिंदे की आवाज़ गूँजी जिसने मेरा ध्यान अपनी ओर खींचा। ध्यान से देखा तो पाया कि एक नन्हा सा तोते का बच्चा मेरे क़रीब रखे हुए मनी प्लांट के पत्तों के पीछे डरा सहमा सा छुपा पड़ा है। याद आया कि घर के सामने वाले पेड़ पर इसका बसेरा था। शायद आँधी में उड़ कर यहाँ आ पहुँचा था। अपनी मासूम आँखों से डरा सहमा सा छुपकर मुझे देख रहा था। एक पल को मैंने उसे निहारा फिर उस पेड़ के आसपास नज़र दौड़ाई। परंतु उसके माता-पिता वहाँ कहीं नज़र नहीं आ रहे थे। शायद आँधी में फँस गए थे।

वह सुनहरे हरे रंग का तोता था। उसकी चोंच बहुत ही प्यारी लग रही थी, बिल्कुल सेव की तरह लाल-लाल। आँखों में चंचलता भरी थी। जब वह नन्हीं ज़ुबान से बोलता तो उसकी मीठी बोली से मेरा रोम-रोम खिल उठता। मन रोमांचित हो जाता।

बेचारा न जाने कब से वहाँ पड़ा होगा। भूख भी लग रही होगी उसे। मैंने एक कटोरी में थोड़ा पानी और एक प्लेट में कटे हुए फल धीरे से ले जाकर उसके पास में रख दिए। परंतु अनजान प्राणी को अपने क़रीब आता देख वह और दुबक गया। मैं थोड़ा पीछे हटा और प्रेम से मुस्कुराते हुए उसकी तरफ़ देखने लगा। पहले तो वह टुकुर-टुकुर मुझे देखता रहा लेकिन जब उसे यह अहसास हो गया कि उसे मुझसे कोई ख़तरा नहीं, तब कहीं जाकर वह उस प्लेट में रखे फलों की तरफ मुड़ा। जैसे ही उसने सेव के एक टुकड़े पर चोंच लगाया सहसा आसमान में उड़ते परिंदों की आवाज़ से उसका ध्यान उनकी तरफ चला गया। वह भी शोरगुल मचाने लगा, जैसे उसे लगा कि उसके माता-पिता उसे ढूँढ़ते हुए आ गए हो। परंतु धीरे-धीरे उनकी आवाज़ धीमी पड़ती गई और वह दूर-दूर और दूर होते गए। वह निराश भाव से पीछे हटकर मुरझा सा गया। पता नहीं कब तक उसके माता-पिता लौटेंगे यह सोच कर मेरा हृदय उस नन्ही सी जान को देखकर द्रवित हो उठा।

मैंने बहुत कोशिश की उसे अपने पास लाने की पर वह सहम जाता था। मनुष्य के साथ यह उसका पहला आमना सामना था। अब मैं भी उसके पास ही दरी बिछाकर उसके साथ उसके माता-पिता की प्रतीक्षा करने लगा। धीरे-धीरे उससे बातचीत करने लगा। थोड़ा-थोड़ा पुचकारने लगा। मैं उसका मन जीतने की कोशिश कर रहा था ताकि वह मुझसे घुल-मिल जाए और उसके मन का डर ख़त्म हो जाए।

काफ़ी वक्त गुज़र गया। अँधेरा होने लगा। परंतु उसके माता-पिता का कोई ठिकाना नहीं था कि कब लौटेंगे। लेकिन मैंने यह निश्चय कर लिया था कि जब तक वह नहीं लौटेंगे, मैं उसे अकेला नहीं छोड़ूँगा। तभी एक अविश्वसनीय घटना हुई। वह ख़ुद धीरे-धीरे चल कर मेरे पास आ गया। उसे मुझ में अपनापन दिख गया था। मैंने उसकी पीठ पर हाथ फेरा। फिर अपनी हथेली पर उठाकर उससे बातें करने लगा। अपनी आवभगत देखकर वह फूला ना समाया और कुछ पल के लिए अपने डर से बाहर निकल गया। मुझे यक़ीन हो गया था कि उसके माता-पिता रास्ता भटक चुके हैं और आज रात शायद नहीं लौट पाएँगे। इसलिए सोचा कि इसे अपने साथ अंदर ले चलूँ और रात भर मैं ही इसका ख़्याल रखूँ।

मैं उसे अपने बिस्तर पर ले आया और उसके पास में एक पानी की कटोरी और एक फल की कटोरी के साथ-साथ कुछ बिस्किट भी रख दिया। भोजन का वक्त हो चुका था। माँ पुकार रही थी, लेकिन मैं उससे दूर जाना नहीं चाहता था ताकि उसे अकेलेपन का एहसास न हो। मैंने माँ को आवाज लगाई कि थाली यहीं पर परोस दें। पर यह क्या जैसे ही मैं भोजन करने के लिए बैठा, वह भी गिरता पड़ता उड़ता हुआ मेरे पास आकर बैठ गया। मैं उसकी गतिविधि की निगरानी करने लगा। वह कभी मुझे देखता, कभी थाली की तरफ़। परंतु मेरी थाली में घुसने या रोटी बाहर खींचने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। मुझसे नहीं रहा गया और मैंने एक रोटी का टुकड़ा उसकी तरफ़ बढ़ाया। उसने झट से रोटी पकड़ ली और कुतर-कुतर कर खाना शुरु कर दिया। इस अवस्था में उसे दुनियादारी की समझ कतई नहीं थी, परंतु प्रेम की भाषा वह निश्चित तौर पर बेहतर तरीक़े से समझता था।

भोजन के पश्चात बिस्तर पर हम दोनों बैठकर एक दूसरे को घूरे जा रहे थे। चंद घड़ियों में ही हम दोनों में एक दोस्ताना रिश्ता बन चुका था। पूरी रात हमने आँखों ही आँखों में बिता दी।

सुबह की पहली किरण फूटते ही पक्षियों का गान शुरू हो गया। मैंने उसे अपनी हथेली पर उठाया और उसे पुचकारते हुए सुप्रभात कहा। फिर बोला "चल तुझे तेरे मम्मी-डैडी से मिलाता हूँ।"
उसको लेकर जब बालकनी में आया तो देखा कि एक तोते का जोड़ा पेड़ के आसपास मँडरा रहा है और किसी की बाट जोह रहा है। उनको देखकर यह नन्ही जान भी फुदक-फुदक कर उन्हें आवाज़ देने लगा। उसके माता-पिता मेरी बालकनी के आसपास आ गए। वह उसे अपने साथ ले जाने की कोशिश में थे। परंतु उन्हें कोई युक्ति समझ नहीं आ रही थी। तब मैंने उनके बच्चे को सीढ़ी की सहायता से उनके कोटर में पहुँचा दिया।

अभी उसे अच्छे से उड़ना नहीं आया था। इसलिए वह अपने कोटर में से मेरी तरफ़ झाँकता और मुझे देखते ही शोरगुल करता। कुछ दिनों में उसके माता-पिता ने उसे उड़ना सिखा दिया था। वह रोज़ मेरी बालकनी में आकर बैठ जाता और काफ़ी देर-देर तक मेरी प्रतीक्षा करता। कई महीने गुज़र गए इस घटना को। वह पहले से काफ़ी बड़ा भी हो गया। परंतु वह आज भी रोज़ मेरी बालकनी में आकर बैठ जाता है। मुझे देखे बिना उसे चैन नहीं आता। जब तक एक झलक उसकी ना पड़ जाए, मैं भी उसके बिना नहीं रह पाता। वह बिन बुलाया मेहमान रोज़ मेरे पास अवश्य आता है और मैं इस प्यारे से मेहमान की मेहमान-नवाज़ी में कोई कसर नहीं छोड़ता। यह प्रेम का ही तो बंधन है जो हम दोनों को आज भी जोड़े हुए है। उसकी अमृत समान मीठी बोली आज भी मेरे कानों में घुलकर मुझे भाव विह्वल कर देती है। जब तक उसे अपने हाथों से कुछ ना खिला दूँ, मुझे चैन नहीं आता।

आशीष कुमार - रोहतास (बिहार)

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