गँवईयत अच्छी लगी - कविता - सिद्धार्थ गोरखपुरी

माँ को न शहर अच्छा लगा न
न शहर की शहरियत अच्छी लगी,
वो लौट आई गाँव वाले बेटे के पास
के उसे गाँव की गँवईयत अच्छी लगी।

ममता भी माँ से थोड़ी अनजान हो गई,
माँ शहर वाले बेटों के यहाँ जब मेहमान हो गई।
गाँव वाला बेटा जब ले आया माँ को घर,
तो गलियाँ, खिड़कियाँ, नीम की छइयाँ
सब के सब मकान हो गईं।
माँ को उसके मन की वसीयत अच्छी लगी।
वो लौट आई गाँव वाले बेटे के पास
के उसे गाँव की गँवईयत अच्छी लगी।।

ख़ुदा ने ख़ुद को जब ख़ुद सा बनाना चाहा,
उसने ये प्रयोग हर माँ पर आजमाना चाहा।
वो जानता था के माँ उससे भी बड़ी है,
बस इस बात को दुनिया को बताना चाहा।
उसे हर एक दौर में माँ की नीयत अच्छी लगी।
वो लौट आई गाँव वाले बेटे के पास
के उसे गाँव की गँवईयत अच्छी लगी।।

शहर और गाँव का ताल्लुक़ उसे अब अच्छा नहीं लगता,
शहर का बच्चा भी अब उसे बचपने से बच्चा नहीं लगता।
उसके कान में मन ने ऐसी बात कह दी के, 
न उसे आदमी अच्छा लगा न उसकी कैफ़ियत अच्छी लगी।
वो लौट आई गाँव वाले बेटे के पास
के उसे गाँव की गँवईयत अच्छी लगी।।

सिद्धार्थ गोरखपुरी - गोरखपुर (उत्तर प्रदेश)

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