अपनी ज़िम्मेदारी समझो - कविता - सरिता श्रीवास्तव "श्री"

अपनी ज़िम्मेदारी समझो, आदतें छोड़ क्यों नही देते, 
समाज की धारा में बहो, बेइज़्ज़ती छोड क्यों नहीं देते।

रात को लौटते हो घर, लड़खड़ाते नशे में धुत्त होकर,
पहुँचाती है बिस्तर पर, पत्नी कंधे का सहारा देकर।
खाना खाया या नहीं, क्या ग़म है बता क्यों नहीं देते।

विरोध करे कोई तो, मारपीट माँ-बेटी से करते हो,
कोई मरता है मरे, तुम कहाँ कब किसकी फ़िक्र करते हो।
माँ बीमार है ग़म में, सुपुत्र बन सहारा क्यों नहीं देते।

नशेबाज़ कहे कोई तो, गालियाँ बेलगाम बकते हो,
खड़े रह नहीं पाते, गाड़ने की ज़िंदा धमकी देते हो।
बेइज़्ज़त हैं सभी अपने, ये रवैए छोड़ क्यों नहीं देते।

पहले तुम ऐसे न थे, परवाह सब लोगों की करते थे,
फरमाबरदार बेटे थे, माँ-बाप का ख़्याल रखते थे।
घुट रहे हो मन ही मन, दर्द दिल का दिखा क्यों नहीं देते। 

बेटी से बेपरवाह, कुछ-कुछ समझ मुझे आने लगा है,
तेरी बेरुखी का सबब, तेरी इच्छा समझाने लगा है।।
तेरी चाह बेटा थी, बेटी को अपना क्यों नहीं लेते।

कितना समझाऊँ तुझे, बेटा-बेटी एक ही समान हैं,
मतकर भेद भाव तू, दोनों ईश्वर का ही वरदान हैं।
बेटी में बेटा देख, "श्री" भ्रम मिटा क्यों नहीं लेते।

सरिता श्रीवास्तव "श्री" - धौलपुर (राजस्थान)

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