मोक्ष - कविता - रमेश चंद्र वाजपेयी

एक भक्त बोला
भगवान मुझे मोक्ष नहीं चाहिए,
माता पिता का प्यार
जीवन साथी का स्नेह बसा हो
केवल और केवल 
वही चाहिए।
जीवन का सच्चा सुख
सन्यास में नहीं,
गृहस्थ का आनंद ही
कुछ और है,
संतोष धन अगर
जिनके पास है
जीवन का सच्चा निचोड़
हर ठौर है।
बच्चों  की किलकारी
और तुतला कर कहना
मैं तो चाँद खिलौना लेहों 
और मुझे कुछ
नहीं चाहिए,
एक भक्त बोला भगवान
मुझे मोक्ष नहीं चाहिए।
उन संतों से पूछो
जिन्होंने मोक्ष के लिए
सारा जीवन
क़ुर्बान कर दिया पर
क्या मिला,
वेद पुराणों में तो यही
कहते हैं 
नर जीवन तो एक बार
मिला।
फिर इस देह को
क्यों दिया सिला।
प्रिय मेरे साथियों
इस जीवन को व्यसन और
पाप रहित बनाओ,
फिर वहीं मिलेगा जो 
तुम्हें चाहिए,
भक्त बोला 
भगवान मुझे 
मोक्ष नहीं
चाहिए।

रमेश चंद्र वाजपेयी - करैरा, शिवपुरी (मध्य प्रदेश)

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