पारो शैवलिनी - चितरंजन (पश्चिम बंगाल)
मेरी तन्हाई है - ग़ज़ल - पारो शैवलिनी
शनिवार, जनवरी 16, 2021
हर तरफ़ ग़म ही ग़म रुसवाई ही रुसवाई है।
तेरी यादें हैं, मैं हूं और मेरी तन्हाई है।।
चांद नहीं आता है नज़र मुझे इस चांदनी में।
चांदनी रात बनी आज फिर हरजाई है।।
मैं अलग हूं, ज़माने से जो ये कहते हैं, झूठे हैं।
यहां तो हर इन्सां बना ख़ुद में तमाशाई है।।
जल उठा दिल मेरा उससे धुआं भी ना हुआ।
ये कैसी आग है और किसने ये लगाई है।।
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