कोरी कल्पना -कविता - अतुल पाठक

कोरी कल्पना -कविता - अतुल पाठक | Hindi Kavita - kori kalpana -Atul Pathak
कोरी-सी एक कल्पना थी,
मन ने जिसे सँजोया था।
न कोई रूप, न कोई रंग,
बस एहसासों में पिरोया था।
आँखों में हल्की-सी चमक,
सपनों ने रंग भर दिए।
अनजाने से उस ख़्याल को,
अपने जैसा कर लिए।
हवा के संग उड़ती जाए,
बादल बनकर छा जाए।
कभी धूप-सी खिल उठे,
कभी छाँव बन मुस्काए।
न कोई सीमा, न बंधन है,
ये मन का अपना संसार।
जहाँ हर इच्छा जीवित हो,
और हर सपना साकार।
कोरी कल्पना ही तो है,
जो जीवन को रंग देती है।
सूने से इस दिल को भी,
एक नई उमंग देती है।


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