सेना का एक सिपाही हूँ - कविता - सतीश शर्मा 'सृजन'

कभी गर्म रेत पर चलता हूँ,
हिम की गोदी में पलता हूँ।
भूचाल, बाढ़ या हो आँधी,
कर्तव्य से नहीं विचलता हूँ।
हथियार लिए मुस्तैद रहूँ,
सीमा पर जय का ग्राही हूँ।

सेना का एक सिपाही हूँ।

सावन आकर चले जाते हैं।
राखी पर हम पछताते हैं।
होली दीवाली जयदशमी,
सरहद पर हम रह जाते हैं।
वर्दी पहने चलता रहता,
जय मंज़िल पथ का राही हूँ।

सेना का एक सिपाही हूँ।

घर में घरनी रह जाती है,
तस्वीर से कुछ बतियाती है।
बच्चों को झूठ मुठ गढ़कर,
पापा की बात बताती है।
जीवन संगिन ख़ुद से कहती,
मुझे नहीं लगता मैं ब्याही हूँ।

सेना का एक सिपाही हूँ।

घर में हो मुंडन या शादी,
नहीँ पहुँचूँगा ऐसा आदी।
कभी प्रशिक्षण कभी निरीक्षण,
कभी हूँ वादी कभी प्रतिवादी।
रिश्तों के इंद्रधनुष रंग में
मुझे लगता काली स्याही हूँ।

सेना का एक सिपाही हूँ।

जितना बन पड़ता करता हूँ,
अपना नीरवपन भरता हूँ।
ख़ुद ही ख़ुद से झगड़ा करता,
कभी ख़ुद ही ख़ुद को अखरता हूँ।
हूँ अलग थलग अपने जन से,
ऐसा लगता एक वाही हूँ।

सेना का एक सिपाही हूँ।

सतीश शर्मा 'सृजन' - लखनऊ (उत्तर प्रदेश)

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