प्रदीप श्रीवास्तव - करैरा, शिवपुरी (मध्यप्रदेश)
रोज़ आते हो - ग़ज़ल - प्रदीप श्रीवास्तव
गुरुवार, मार्च 11, 2021
मेरे ख़्वावों में, रोज़ आते हो।
मेरे कानों में, गुनगुनाते हो।।
तेरे कूचे से, जब निकलता हूँ,
तो खड़े छत, पे मुस्कुराते हो।
ख़ुशबुओं से हों, तर-ब-तर राहें,
रोज़ जिनसे भी, आते-जाते हो।
चंद लम्हों का, साथ दो मुझको,
रोज़ ऐसे ही, टाल जाते हो।
ये हवा, धूप, चाँदनी, शबनम,
सबमें बस तुम, ही झिलमिलाते हो।
छोटे बच्चों सी, हरकतें लगतीं,
जब भी बरसात, में नहाते हो।
साहित्य रचना को YouTube पर Subscribe करें।
देखिए साहित्य से जुड़ी Videos
साहित्य रचना कोष में पढ़िएँ
विशेष रचनाएँ
दीपावली विशेष रचनाएँ: कविता, गीत, दोहे और मुक्तक का सुंदर संकलन
सुप्रसिद्ध कवियों की देशभक्ति कविताएँ
अटल बिहारी वाजपेयी की देशभक्ति कविताएँ
फ़िराक़ गोरखपुरी के 30 मशहूर शेर
दुष्यंत कुमार की 10 चुनिंदा ग़ज़लें
कैफ़ी आज़मी के 10 बेहतरीन शेर
कबीर दास के 15 लोकप्रिय दोहे
भारतवर्षोन्नति कैसे हो सकती है? - भारतेंदु हरिश्चंद्र
पंच परमेश्वर - कहानी - प्रेमचंद
मिर्ज़ा ग़ालिब के 30 मशहूर शेर

