कोरे पन्नों का विवेक - कविता - सतीश धर

कोरे पन्नों का विवेक - कविता - सतीश धर | Hindi Kavita - Kore Pannon Ka Vivek - Satish Dhar
मैं कोरे पन्नों पर
लिखी जाने वाली कविताओं
के बारे में सोच रहा हूँ
क्यों नहीं लिखी गईं
आज तक इन पन्नों पर कविताएँ।

भीड़ में सबसे आगे
चिल्ला-चिल्ला कर
जो निगल रहे थे
समूची भीड़ का विवेक—

अचानक
उनका भी हौसला
पस्त पड़ गया है।

वही खोज पाते हैं नए रास्ते
जिन्हें अब भी
पगडंडियाँ याद रहती हैं।

स्मृति-लोप के भयानक संकट में
नए गीत
स्वतः नहीं बनते।

कोरे पन्नों पर
अब प्रश्न यह नहीं
क्या लिखा जाएगा—
बल्कि यह कि
कविता लिखी जाएगी
या
लोकगीत।

सतीश धर - ग़ाज़ियाबाद (उत्तर प्रदेश)

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