संदेश
मैं प्रकृति प्रेमी - कविता - रूशदा नाज़
मैं प्रकृति प्रेमी वो मेरी हमसाथी। मैं उदास हूँ, वो भी उदास हो जाती, मैं निराश हूँ, वो भी अश्क बहाती। उमड़ते-घुमड़ते बादल मेरे दु:खो क…
हरी भरी हो धरती अपनी - कविता - बृज उमराव
हरी भरी हो धरती अपनी, देती जीवन वायु। पथ में पथिक छाँव लेता हो, शुद्ध करे स्नायु॥ तापान्तर में वृद्धि दिख रही, जागरूक हो जनमानस। …
ब्रह्मानंद का स्वर्ग दौरा - कहानी - अशफ़ाक अहमद ख़ां
यू॰पी॰ के कई ज़िले पिछले दिनों सूखे की चपेट में थे। किसान पूरे सावन इंद्रदेव की तरफ आशा भरी निगाहों से देखते रहे, इंद्र देव को ख़ुश करने…
नयनों के दीप जले हैं - कविता - राकेश कुशवाहा राही
नयनों के दीप जले हैं, काजल से सुन्दर सजे हैं। अंतस मे कुछ सपने हैं, जिसमें जीवन के रंग भरे हैं। नयनों के दीप जले हैं। पीली सरसों झूम र…
जुगनू - कविता - सुनील कुमार महला
जुगनुओं सा होना चाहिए जीवन जग को प्रकाशमान करते मिटाते अँधियारा घोर अँधकार में जब टिमटिमाते हैं जुगनू आनंद से भर उठते हैं अनगिनत हृदय …
अर्पित करना चाहूँ - कविता - इन्द्र प्रसाद
सूरज की किरणें जब आ करके जगाती हैं। कलियाँ प्रतिउत्तर में खिलकर मुस्काती हैं॥ ये मौन दृश्य सारा दिल को छू लेता है। उस जगतनियंता की अन…
प्रकृति और अँधेरा - कविता - डॉ॰ आलोक चांटिया
मानते क्यों नहीं इस दुनिया में आने के लिए हर बीज ने एक अँधेरा गर्भ में जिया है पृथ्वी को तोड़कर या गर्भ की असीम प्रसव पीड़ा के बाद …
एक ठिगना पौधा - कविता - संजय कुमार चौरसिया 'साहित्य सृजन'
एक विशालकाय तरु के नीचे, ख़ुद उसकी पत्तियों से ढका हुआ, पृथ्वी का अर्द्ध छिपा भाग, जिसको देखते भावों में एक अभिव्यक्ति का नया अवतरण सीध…
मेरी बेटी - प्रकृति रानी - कविता - डॉ॰ विजयलक्ष्मी पाण्डेय
कर रही भूमि का आराधन प्रकृति रानी, मैं बैठी उपवन में देख रही मंद स्मित! भोर बेला में धरती का अनुपम शृंगार, गुलमोहर पुष्पों की लाल सुर्…
सबका जीवन आनंदमय बना दे - कविता - रविंद्र दुबे 'बाबु'
मिले मुंडेर पर, सोंधी-सोंधी ताज़ी हवा का, ये झोंका जो, कभी धूप खिले, कभी छाँव बने कुदरत ने रंग बिखेरा जो। आसमान में, हलचल करती काली घट…
पर्यावरण संरक्षण - कविता - रमाकांत सोनी
कुदरत का उपहार वन, जन जीवन आधार वन। जंगल धरा का शृंगार, हरियाली बहार वन। बेज़ुबानों का ठौर ठिकाना, संपदा का ख़ूब खजाना। प्रकृति मुस्कुरा…
चंचल कलियाँ - कविता - संगीता राजपूत 'श्यामा'
ऋतु सावन की झोंके खाए कजरी मल्हार मे ठनी झूले झूल उठे डाली पे कली मकरंद संग सनी। नाच रहे हैं पत्ते देखो मेघ द्वार बरसे बूँदे घटा म…
महकती बहारें - कविता - रमाकांत सोनी
फ़िज़ाओं में ख़ुशबू फैली खिल गए चमन सारे, झूम-झूम लगे नाचने लो आई महकती बहारें। वादियों में रौनक आई लबों पे मुस्कानें छाई, प्रीत भरे तरा…
प्रकृति का अनोखा अवतार - कविता - प्रतिभा नायक
भोर भई भानु चढ़ आए नीले अनन्त आकाश पर सूर्य की ललित लालिमा प्रभात गीत गाए गगन पर। चढ़े सूरज सीस पर धूप चुभती चटक सूई सी शूल समान दिनकर…
मायूस धरती - कविता - डॉ॰ मीनू पूनिया
आँचल में मैंने तुम्हे खिलाया, बारिश का निर्मल जल पिलाया, आशियाना बनाने को दिया स्थान, बरसाया मैंने तुम सब पर दुलार। फल खाकर मेरे मिटाई…
प्रकृति - कविता - भुवनेश नौडियाल
प्रकृति है, अद्भुत, अनोखी, सुंदरी न्यारी, निर्झर बहती नदिया सारी। जिसमें रहते जीव अनोखें, प्रकृति में ही रहते मोहे। मनमोहक है, रूप नि…
हरित वसुंधरा - कविता - अनिल मिश्र प्रहरी
देख अम्बर मेघ फूलों के अधर लाली, प्रेमरत मधुकर, मगन मकरंद, तरु-डाली। वल्लरी झूमे, पवन मुकुलित कली चूमे, कर रही अरुणिम प्रभा रुत मत्त, …
ग्लोबल वार्मिंग - कविता - डॉ॰ उदय शंकर अवस्थी
धरती गरमा रही है तो क्या हुआ? कुछ गर्माहट आप तक पहुँची क्या? धरती गरमाने का मतलब? "ग्लोबल वार्मिंग" अंग्रेजी में? हाँ सुना त…
तुम मुझे संरक्षण दो, मैं तुम्हें हरियाली दूँगा - कविता - पारो शैवलिनी
काटो और काटो और और काटो क्योंकि, कटना ही तो नियति है मेरी। अगर कटूँगा नहीं तो बटूँगा कैसे? कभी छत, कभी चौखट कभी खिडक़ी, कभी खम्भों क…
सावन - दोहा छंद - दीपा पाण्डेय
धरती माँ दिखला रही, सबको अपना रूप। सावन में बरसात का, होता यही स्वरूप।। नदियों की गति तीव्र है, जाओ कभी न पास। जाने कितने बह गए, थे जो…
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