संदेश
प्रश्न नहीं, परिभाषा बदलनी होगी - कविता - अपराजितापरम
चाहती हूँ, उकेरना, औरत के समग्र रूप को, इस असीमित आकाश में...! जिसके विशाल हृदय में जज़्बातों का अथाह सागर, जैसे- संपूर्ण सृष्टि की भाव…
औरतें जिन्हें इतिहास जगह देगा - कविता - डॉ॰ चित्रलेखा अंशु
औरतें पढ़ रही हैं स्टेटिस्टिक गढ़ रही हैं मैथ्स के फार्मूले छूट रहा है उनसे रसोई उनके भी दो ही हाथ हैं दोनों हाथ लिखने में व्यस्त होंग…
समता की अधिकारी 'नारी' - कविता - आशीष कुमार
लड़ रही लड़ाई अपनी गर्भ से ही अस्तित्व की पहचान की घर से लेकर बाहर तक हर एक मुद्दे पर ख़ुद को स्थापित की है अपनी मेहनत से लगन से मेधा स…
मान करो या अपमान करो - कविता - गणेश भारद्वाज
मैं नर की पूरक नारी हूँ नर से मेरी होड़ नहीं है, भाव सरल सब सीधे मेरे पथ में कोई मोड़ नहीं है। मैं मालिन बाग बगीचों की सबका मन बहलाने…
मैं औरत हूँ - कविता - दीक्षा
मैं कोमल हूँ, कमज़ोर नहीं मैं गर्व हूँ, मग़रूर नहीं मैं औरत हूँ कोई डोर नहीं बाँधके न रखो मुझे, तोड़ सब ज़ंजीरे जाऊँगी अँधेरे का सामना तो …
सुनो न - कविता - राशि गुप्ता
सुनो न... मेरे भी हैं कुछ ख़्वाब, बंद पिंजरे में मैं तकती आसमान को हूँ, पूरे करने को वे मेरे अरमान... सुनो न... सुनो न... मत बाँधों न…
माँ - कविता - शीतल शैलेन्द्र 'देवयानी'
नौ महीने प्यार से कोख में रखकर, जन्म देती है तुझे एक नारी। नारी से फिर माँ बनकर, ख़ुद अपने को धन्य समझती है नारी। न कभी बोझ तुझे समझा न…
नारी स्वाभिमान - कविता - ज्योति सिन्हा
दिल चाहता है कलम उठा कर, लिख दे आज अपनी तक़दीर, आज जो जीवन हमें मिला है, पसंद नहीं हमें ये हमारी तस्वीर। हम अपनी बाबुल की बिटिया, वह सम…
नारी - कविता - ब्रजेश कुमार
नारी के बिना सृष्टि की रचना असंभव है, इस से ही जग में जीवन का उद्भव है। प्रकृति के कण-कण में है नारी का अंश, फिर भी क्यों झेलती है…
नारी की समाज में नारायणी भूमिका - आलेख - सुधीर श्रीवास्तव
सृष्टि निर्माण और उसके अबाध संचालन के केंद्र में नारी है, ईश्वर के बाद सांसारिक धुरी नारी ही है। नारी सिर्फ़ सृजक भर नहीं है। सृजन संतु…
दुनियाँ में नारी सच्चा किरदार निभाए - कविता - बीरेंद्र सिंह अठवाल
दुनियाँ में नारी सच्चा किरदार निभाए। ख़ुशबू से भरपूर बसेरा गुलज़ार बनाए।। अपनों के नाम करदे अपनी सब साँसे, ख़ामोश रहे उफ भी निकले न ज़ुब…
गाँव की औरतें - कविता - यश वट
गाँव की औरतें नहीं लगाती सनस्क्रीन, वे पायल, बाली, काँटा, नथनी, बिंदी, क्लिनिक प्लस और थोड़ा सा पाउडर लगा, लड़ लेती है धूप से यूँ ही, …
पितृसत्तात्मक समाज और स्त्री जीवन - कविता - नीलम गुप्ता
एक स्त्री की ज़िंदगी को, क्या बनाकर रख दिया है? इन पितृसत्तात्मक समाज के लोगों ने। पीहर में पली बढ़ी तो गुड़िया देकर उसे, उसके अस्तित्व…
नारी का अस्तित्व - कविता - बीरेंद्र सिंह अठवाल
ख़ुशी कम दुख ज़्यादा सहन करती है नारी, हर घड़ी काँटों की डगर से गुज़रती है नारी। सदियों से नारी को क्यों देना पड़ा इम्तहान, समस्या नारी क…
महिला उत्थान - कविता - पशुपतिनाथ प्रसाद
नारी की आई बारी, क़ानून हुआ जारी, मुक्ति मिली है भारी, नारी नहीं बेचारी। बेटी उठाकर बास्ता, स्कूल के चली रास्ता, बनेगी कर्मचारी, नारी क…
हांँ भारत की नारी है वो - कविता - राघवेंद्र सिंह
कहीं चांँदनी सी है चंचल, कहीं दामिनी सा उद्घोष। कहीं करुण सी है तरुणाई, कहीं ज्वाल सा दिखा रोष। फूल नहीं चिंगारी है वो, हांँ भारत की न…
सिंहनी - कविता - सुषमा दीक्षित शुक्ला
स्वर्ण की ज़ंजीर बाँधे, स्वान फिर भी स्वान है। धूल धूषित सिंहनी, पाती सदा सम्मान है। आत्मनिर्भर स्वाभिमानी, शौर्य ही पहचान है। हार ना …
हे स्त्री! तुम शक्ति की प्रतिमूर्ति - कविता - आशीष कुमार
तुम अष्टभुजा तुम सरस्वती, तुम कालरात्रि तुम भगवती, हे स्त्री! तुम शक्ति की प्रतिमूर्ति। ज्ञान का भंडार खोलती, शंकराचार्य का दंभ तोड़ती…
कसक दिल की - कविता - प्रवीणा
मैं एक स्त्री हूँ और साथ ही साथ किसी की बेटी तो किसी की बहू हूँ, किसी की बहन, किसी की भाभी तो किसी की ननद हूँ, किसी की पत्नी तो किसी क…
नारी जीवन - गीत - शिव शरण सिंह चौहान 'अंशुमाली'
ओ नारी! तुम दिव्य धरा में अविरल करूँ तुम्हारा वंदन। ममता की प्रतिमूर्ति मनोरम ओ! माता की करुण कहानी। पयशाला का भार लिए उर सजल नयन से झ…
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