संदेश
माँ - नवगीत - सुशील शर्मा
तेज़ धूप में बरगद जैसी छाया माँ। झुर्री वाली प्यारी प्यारी काया माँ। मेरे मानस की लहरी में, सदा सुहागन मेरी माँ। मेरी जीवन शैली में, सु…
मुस्कान से भरी - नवगीत - अविनाश ब्यौहार
खेत में फ़सल है मुस्कान से भरी। ख़्यालों के क़ाफ़िले हैं रुके हुए। बरगद के कंधे लगता झुके हुए॥ फ़सलों की साड़ी लगती हरी-हरी। नन्हे-नन्हे हा…
ख़ुद से मुलाक़ात - नवगीत - सुशील शर्मा
ख़ुद से मुलाक़ात चलो करें आज। अकेले-अकेले बहुत दिन बीते। रिश्तों के बस्ते कुछ भरे रीते। चलो आज गाएँ वासंती साज। गाँवों के पनघट सब लगें स…
हम हैं डरे-डरे - नवगीत - अविनाश ब्यौहार
फफक-फफक कर आँखें रोईं आँसू नहीं झरे। तुषार छाया शहर-शहर है। जाड़ा ढाता रहा क़हर है॥ मौसम के जैसे देखो तो लगते घाव हरे। आपसदारी लोग भूलत…
कोरस में गातीं - नवगीत - अविनाश ब्यौहार
बहुत दिनों से नहीं आ रही पुरवा की पाती। धूप-दरीचे हिले-मिले हैं। मिटते शिकवे और गिले हैं॥ मन मेरा बंगाली है तो तन है गुजराती। छानी में…
छाया त्रासन है - नवगीत - अविनाश ब्यौहार
नहीं फटकता अँधकार पहरुए हैं उजाले के। अँधकार का नाश करेंगे दिए दिवाली के। हथकड़ियाँ हाँथों में होंगी किसी मवाली के।। हैं कभी-कभी फ़साद …
ज़रा सा क़यास लगा - नवगीत - अविनाश ब्यौहार
देवशयनी एकादशी है चातुर्मास लगा। मंगल कार्य नहीं हो सकते। पर्यंक पे नहीं सो सकते॥ बेगैरत उनने माना हमको ख़ास लगा। अधिकारी की बल्ले-बल्ल…
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