संदेश
देह अगोचर - नवगीत - अविनाश ब्यौहार
हरियाली की देह अगोचर पात लगे झरने। पड़ता लू का पेड़, पत्ते, फूल पर साया। आग हुई सूर्य किरण बहुत क़हर बरपाया।। नदिया, झरने, ताल लगे हैं…
प्यास वाले दिन - नवगीत - अविनाश ब्यौहार
लगे सताने झोपड़ियों को भूख औ प्यास वाले दिन। धूप है दिवस को कचोटने लगी। जब-तब लू हवा को टोंकने लगी।। जीवन में जबकि देखे हैं कड़वे अहसा…
उम्मीद पर करने लगी संवेदना हस्ताक्षर - नवगीत - अविनाश ब्यौहार
उम्मीद पर करने लगी संवेदना हस्ताक्षर। हैं ख़्वाब आँखों के पखेरू हो गए। विश्वास के पर्वत सुमेरू हो गए।। आशा अँगूठा छाप थी अब हो गई है सा…
जाड़े का मौसम - नवगीत - अविनाश ब्यौहार
सबको बहुत लुभाता है जाड़े का मौसम। महल, झोपड़ी, गाँव शहर हो। या फिर दिन के आठ पहर हो।। कभी कभी तो लगता है भाड़े का मौसम। कंबल, स्वेटर …
खेले दिनमान - नवगीत - अविनाश ब्यौहार
भोर हुई प्राची की गोद में खेले दिनमान! दिन उदय होते ही अँधेरा दूर हुआ! रात में नीड़ों में आराम भरपूर हुआ! दिन चढ़े सूरज ने कर दिया ध…
चाँद-तारे दे रहे बधाईयाँ - नवगीत - अविनाश ब्यौहार
नव वर्ष में चाँद-तारे दे रहे बधाईयाँ। प्रात कपासी हुई तो दिन सुनहरे हों। घर-आँगन में ख़ुशी के ही ककहरे हों।। बात करें गुपचुप-गुपचुप ऊन …
शीशम-सागौन - नवगीत - अविनाश ब्यौहार
घर-घर पहचाने है शीशम-सागौन! महिमा है इनकी भी कुछ कम नही! इमारती लकड़ी है बेदम नही! भोर उठी कर रही नीम का दातौन! होता है पेड़ से स्वच्छ…
नदी की कहानी - नवगीत - अविनाश ब्यौहार
कौतुकी हुई है नदी की कहानी। उद्गम से शुरू फिर चौड़ा है पाट। मिलते हैं रस्ते में नदिया औ घाट।। चूमें है चश्म मौजों की रवानी। काटा है रास…
गुलमोहर - नवगीत - अविनाश ब्यौहार
गुलमोहर मानो स्वर्ग का फूल! लबालब भरा है पराग! खुले मधुमक्खी के भाग! मधुका का छत्ता रहा है झूल! धधके अंगार सा रंग! खिले हैं मधुऋतु क…
प्यासी है प्यास - नवगीत - अविनाश ब्यौहार
है अथाह जलराशि प्यासी है प्यास। ज्वार भाटा सौंदर्य है सागर का। दुःख सुनता कौन छूछी गागर का।। नखत हैं फिर भी सूना सा आकाश। चक्षु में आँ…
काँधे पर चढ़ी धूप - नवगीत - अविनाश ब्यौहार
पशु-पक्षी और पेड़ों ने जीवन में कितने रंग भरे। है दिवस के काँधे पर चढ़ी धूप। होगा सागर सरिताओं का भूप।। चलते हुए समीर में देखो अलमस…
नाव घाट लगी - नवगीत - अविनाश ब्यौहार
नैतिकता की बात करें क्या मन में गाँठ लगी। कालोनी में मन-मुटाव का जंगल ऊगा है। मन में पश्चाताप लिए फिर सूरज डूबा है।। खेल-कूद में रमे ह…
बड़ा झमेला है - नवगीत - अविनाश ब्यौहार
गाँव लगे हैं ठीक शहर में- बड़ा झमेला है। दरका-दरका लग रहा आकाश। है चुभ रहा काँटों सा भुजपाश।। तारे तो हैं मगर स्वयं में चाँद अकेला है।…
क्रोध में अंधा - नवगीत - अविनाश ब्यौहार
दोपहर भट्टी सी जलती सूरज हुआ- क्रोध में अंधा। लू का कोषालय है जेठ बना होगा। न शहरी, न देहाती ठेठ बना होगा।। प्यासे को पानी बेचती मंद ह…
सब दिन होत न एक समान - नवगीत - रमाकांत सोनी
आज आदमी व्यथित हो रहा, चिंतातुर नर दिखता श्रीमान। आया समय विकट महामारी, सब दिन होत न एक समान।। संकट में धीरज धर मानव, रखना सब अपनों का…
मासूमों से हारे - नवगीत - अविनाश ब्यौहार
चाँद तारे अंबर को लगते बहुत प्यारे। ख़्वाब ज्यों इत्र के सरोवर में नहाए। पहाड़ पर चरवाहा बाँसुरी बजाए।। सुगंध से विवाह रचे फूल हैं कुँआ…
माता - नवगीत - डॉ. सरला सिंह "स्निग्धा"
आई माता द्वार पर, गूँज रही जयकार। हर्षित मन इतरा रहा सपने हैं साकार। मन में दीपक नेह का, जला आरती आज। करना माँ सब पर कृपा, पूरी करना…
भटक रहे पाँव - नवगीत - अविनाश ब्यौहार
सतरंगी इन्द्रधनुष बुन रहा आकाश। है मन ऐसे खिला-खिला जैसे पलाश।। बल्लियों सा उछलता है ये दिल। तय करना दूरी होता मुश्किल।। मीलों भटक रहे…
बधाई दे रहे - नवगीत - अविनाश ब्यौहार
नये साल की सबको हम बधाई दे रहे। उजले-उजले दिन हों महकी-महकी रातें। और किसी रिंद की हों बहकी-बहकी बातें।। फूल अपने चेहरे की लुनाई दे रह…
ई मेल - नवगीत - अविनाश ब्यौहार
सुख-दुख हो गए मानो धूप-छाँव का खेल। दिन मुसाफ़िर से आते और जाते हैं। किसी परिचित से हम खड़े बतियाते हैं।। स्टेशन हम पहुँचे थे तभी छूट ग…
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