सुन सके न तुम मेरी आवाज़ को - कविता - केतन यादव

सुन सके न तुम मेरी आवाज़ को
किन्तु मेरी प्रार्थनाओं में रहे।

वो दिवस का बोझ ढोकर स्नेह से
साँवली सी साँझ मेरी आ रही,
दाँत से अपने दबाए होठ को
नाम चुपके से पुकारे जा रही।

दीप बुझ जाते क्षितिज पर रोज दो
शेष निशि की अर्चनाओं में बहे।

रो पड़ा अंबर बरस सौ बू़ँद ले
ज्यों धरा व्याकुल पुकारी प्यास से,
द्वार पर सूने रहे कुछ देश में
देहरी भीगी रही नित आस में।

त्रास आँखो की कहानी स्वप्न की 
आँसुओं को वेदनाओं ने गहे।

इक अपरिचित पत्र यू़ँ लिखते रहे
पर उसे भेजे कभी ना डाक में,
आँख मू़ँदेंगे तुम्हे ही देखकर
साँस यू़ँ लेते रहे इस ताक में।

हम कहाँ कुछ बोल पाए आज तक
गीत मेरी भावनाओं ने कहे।

केतन यादव - गोरखपुर (उत्तर प्रदेश)

साहित्य रचना को YouTube पर Subscribe करें।
देखिये हर रोज साहित्य से जुड़ी Videos